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स्याही अभी सूखी नहीं है - 2

Aryan Yadav

Aryan Yadav

August 9, 2026

स्याही अभी सूखी नहीं है - 2

स्याही अभी सूखी नहीं है लिखने के बाद मुझे कई जगह कुछ और पंक्तियाँ लिखी हुई मिल गईं। खैर, मैंने उन्हें ढूँढने का प्रयास तो नहीं किया, लेकिन जब सामने आ गईं तो मैंने उन्हें समेट लिया। उन्हीं समेटी हुई पंक्तियों में जो कुछ अनकहा रह गया, उसको आज कहने जा रहा हूँ।

कमाल की बात है कि इन पंक्तियों को लिखे लगभग पाँच साल से भी अधिक समय हो गया है, लेकिन फिर भी मैं इसके हर एक शब्द को इस तरह महसूस कर सकता हूँ, जैसे ये कल की ही तो बात है। साथ ही, मैं महसूस कर सकता हूँ उसके होने को, मैं महसूस कर सकता हूँ उसकी श्वास को।

मुझे याद आता है कि उसकी श्वास मुझे दुनिया का सबसे खूबसूरत एहसास लगती थी। आपको जानकर हैरानी होगी कि एक प्रेमी और प्रेमिका के बीच सबसे बड़ी बाधा यह शरीर होता है, जो दोनों के मिलन के बीच आ जाता है। और यही उसकी श्वास, जो उसके रोम-रोम को छूकर मुझ तक आती थी, इस बाधा को दूर कर देती थी और बिना उसे छुए, मुझे उसमें मिल जाने का एहसास दिलाती थी।

मैंने जब भी उसको देखा, उसे संसार में सबसे सुंदर पाया। शहर में रहने के बावजूद भी उसके सिवा कभी कोई सुंदर मुझे लगा ही नहीं। अक्सर प्रेमी को उसकी प्रेमिका के अलावा कोई और दिखा ही नहीं। इसी प्रेम में पड़े, मैंने कभी उसको देखते हुए लिखा था कि:

तेरी सादगी में इतना हुस्न है,

तेरा श्रृंगार कैसा होगा...

आँखें चुंधिया जाएँगी मेरी,

फिर तेरा दीदार कैसे होगा...

कहने का मतलब है कि उसका रूप मुझे उसकी सादगी में ही मोह लेता था। न जाने श्रृंगार में मेरी आँखें उसे किस तरह ख़ुद में समा पातीं। खैर, समय के साथ मैंने जाना कि यह आकर्षण रूप का नहीं, बल्कि प्रेम का होता है। और प्रेम सामने वाले में नहीं, बल्कि हमारे भीतर होता है।

कई बार ऐसा होता है कि जब आप किसी ऐसी जगह को देखते हैं या किसी ऐसे व्यक्ति के बारे में सोचते हैं, जिसके साथ आपने अपने जीवन का एक लंबा समय बिताया था, लेकिन अब वह आपके साथ नहीं है। और साथ ही, न तो वह समय वैसा रह गया है, न ही वह जगह। तब वह बीता हुआ समय किसी टूटे हुए सपने की तरह लगने लगता है। और दर्द तब और बढ़ जाता है, जब यह एहसास होता है कि वह कभी हक़ीक़त था, जिसे हमने जिया था, लेकिन अब न वह समय लौट सकता है और न वह व्यक्ति।

और यही सब सोचते हुए मैंने कभी लिखा था कि...

वो.. जो अब नही है,

न जाने क्यों आज भी अपना लगता है।

जिसे कभी खुली आंखों से देखा था,

वो अब एक टूटा हुआ सपना लगता है।

( उसके जाने के बाद ) जब अक्सर रात में नींद नहीं आती थी, तब वह मेरे ख़यालों में आती थी। दिखाई नहीं देती थी, बस मन में उसका एक प्रतिबिंब-सा उभर आता था। उसी प्रतिबिंब को हक़ीक़त में बदलने के लिए मैं आँखें बंद कर उसके सामने होने को महसूस किया करता था - मानो उस सपने को हक़ीक़त में उतारने की एक कोशिश कर रहा हूँ। सामने वह हो या न हो, मैं उसे महसूस किया करता था। और तभी मैंने लिखा:

नींद के अँधियारों में

मैं आज भी तुझसे बात किया करता हूँ।

तू नज़र तो नहीं आती,

लेकिन तुझे महसूस किया करता हूँ।

एक लंबे समय के बाद, ज़िंदगी की उथल-पुथल और भाग-दौड़ से कुछ पल चुराकर ऋषिकेश में जानकी पुल के नीचे बहते पानी में उतरने का अवसर मिला। पानी में कदम रखते ही भीतर एक ठहराव-सा उतर आया। पैरों के ऊपर से बहते पानी की चंचलता, उसकी निरंतर आवाज़ और चारों ओर पसरी वह शांति - सब कुछ ऐसा था, मानो मन ने पहली बार कुछ न चाहने की इच्छा की हो।

न कहीं लौटने की जल्दी थी, न कुछ छूट जाने का डर, न कुछ पा लेने की चाह। बस जो है, उसी के साथ, उसी क्षण में यहीं ठहर जाने का मन था। शायद ज़िंदगी में कुछ पल ऐसे भी होने चाहिए, जहाँ हम न अतीत की ओर लौटना चाहें, न भविष्य की ओर भागें; जहाँ बस उस बहते पानी की तरह बहते हुए, उसी क्षण में होना ही पर्याप्त लगे।

मैने भी बहते पानी में उतर कर देखा है,

ठहराव ज्यादा है वहां...

प्रेमिका के बिछड़ जाने के दुख, दर्द और पीड़ा का चित्रण करना शायद संभव नहीं। भाव समय-समय पर बदलते रहते हैं—कभी स्वीकृति का भाव, तो कभी आश्चर्य का; कभी गुस्सा, तो कभी शंका; कभी नफ़रत, तो कभी सवाल। एक-एक करके ये सभी भाव आते और जाते रहते हैं।

लेकिन इनमें से सबसे सुंदर घटना तब घटती है, जब मैं उसके जाने को, उसके व्यवहार को, उसके कर्मों को, उसके छल को, उसके झूठ को और आज के सत्य को स्वीकार कर लेता हूँ और शांत हो जाता हूँ। जैसे मैं किसी शून्य में खो गया हूँ, जैसे भीतर जो शोर मचा हुआ था, वह अब शांत हो गया हो।

और उस पल मुझे उससे फिर प्रेम हो जाता है। उसके होने या न होने से परे, मैं फिर उसी प्रेम के अमृतरूपी भाव में खो जाता हूँ।

जब मैं सुन्य हो जाता हूं, 

तब में एक प्रेमी बन जाता हूं।

वो प्रेमी जिसकी कोई प्रेमिका तो नही है, 

लेकिन अपने एकांत को ही एक प्रेमिका का चित्रण दे

उसके आलिंगन में लेट

मैं सब त्रिश्नाओ से मुक्त हो जाता हूं।

इन्हीं में से एक भाव घृणा का था, और जब नफ़रत की सीमा पार होती तो मन करता था कि...

वो दिखे तो आँखें बंद कर लूं,

वो बोले तो कानों को धक  लूं।

आँखें बंद कर जो महसूस करता था उसे,

पास आए तो सांसे बंद कर लूं।

आगे लिख पाना बड़ा मुश्किल लगने लगा है, लेकिन कुछ और पंक्तियाँ अभी रह गई हैं। उन्हें लिखे बिना विदा लेना शायद उन पंक्तियों के साथ ज्यादती होगी। लेकिन इन पंक्तियों को बिना इसके पीछे की कहानी बताए समझा पाना थोड़ा मुश्किल होगा, फिर भी इनको यूँ ही, बिना भाव स्पष्ट किए, लिख देता हूँ।

"झूठ" तू भी अजीब जिद्द करता है,

खुद के लिए "सच" की उम्मीद करता है।

महफिलों से दूर करके खुद जाके महफिल में बैठ गया

uska ईमान mujhse बेईमानी कर गया।

हमारा भविष्य मेरे हाथ में है कहकर खुद हाथ छुड़ा गया 

uska भोलापन mujhse चालाकी कर गया।

अंत में जाते-जाते बस इतना कहूँगा कि प्रेम एक सुंदर एहसास। मैंने भी प्रेम किया है और मैंने पाया कि प्रेम सभी भावों में श्रेष्ठ है। लेकिन मनुष्य का स्वभाव कई भावों का दर्पण है। कभी कोई भाव उफान पर रहता है, तो कभी कोई।

प्रेम का भाव आपके भीतर भी है और हमेशा रहेगा, लेकिन ऐसा नहीं कि हर समय वही भाव सबसे प्रबल रहे। कभी गुस्सा आएगा, कभी डर, कभी वासना, कभी घृणा, कभी आकर्षण, तो कभी प्रेम। इसीलिए केवल प्रेम के होने मात्र से कोई संबंध नहीं चल सकता। प्रेम के साथ व्यक्ति को अपनी नैतिकता को भी जागृत रखना पड़ता है। क्योंकि हर समय प्रेम का भाव प्रबल नहीं रहेगा; कभी दूसरे भाव उस पर हावी होंगे, कभी मन विचलित होगा, कभी परिस्थितियाँ आपको ऐसे निर्णय लेने के लिए उकसाएँगी जो आपके प्रेम के विपरीत हों। उन क्षणों में भी व्यक्ति को अपनी बुद्धि और नैतिकता का साथ नहीं छोड़ना चाहिए।

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