कभी कहीं तन्हाई के किसी कोने में किसी को याद करते हुए यूँ ही कुछ लिख दिया करता था उन्हीं बिखरे लम्हों की लेखनी आज यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ। हालाँकि इन्हें लिखे हुए अरसा बीत गया है, लेकिन जब इन पन्नों पर फिर से हाथ फेरता हूँ तो लगता है स्याही अब भी पूरी तरह सूखी नहीं है।
इन्हीं में से एक मैंने तब लिखा था, जब किसी के इंतज़ार में इतना समय बीत गया कि अब इंतज़ार और तन्हाई से ही मोहब्बत हो गई। मुझे याद है, जब वो मेरे साथ थी तो मैं सोचा करता था वो तन्हाई भी कितनी खूबसूरत होगी जिसकी वजह तुम होगी, वो इंतज़ार भी कितना हसीन होगा जिसकी सूरत तुम होगी। और फिर वो समय आया भी जब वो मेरे साथ नहीं थी, तभी मैंने लिखा
मुझे फिर एक दफ़ा मोहब्बत हो गई है,
मेरी तन्हाई ही अब मेरी हमनवा हो गई है।ख़ुद की तरह मुझे बेवफ़ा न बना,
मेहबूब मेरे - तू लौटकर न आ।
इसी के साथ जब मैंने जाना कि उसकी चाह शायद एक फूल से भर नहीं सकती, तो मैंने लिखा —
तेरा-मेरा मेल नहीं,
प्रेम बच्चों का खेल नहीं।आसमान से ऊँचे शौक़ तेरे,
मेरी प्रेम से ज़्यादा चाह नहीं।तू भँवरा सुंदर एक बगिया की,
मैं उस बगिया का फूल नहीं।तेरा-मेरा मेल नहीं,
प्रेम बच्चों का खेल नहीं।
कई बार उससे बात करने का मन करता था, लेकिन न बात करने का कोई साधन था न अपनी बात पहुंचा पाने का कोई रास्ता। तो यूँ ही लिख लिया करता था, ये सोचकर कि शायद कभी मिलेगी तो उसके सामने ये सारे पन्ने खोल कर रख दूँगा। लेकिन मैं जानता था — अब वो नहीं मिलेगी, और अगर मिल भी गई तो मैं कुछ कह नहीं पाऊँगा। इसीलिए मैंने लिखा —
चलो, हृदय से निकली
उसकी ज़ुबानी (हृदय की) सुनें,तू पढ़े या न पढ़े,
तेरी रूह को एक ख़त लिखें।
वो समय ही ऐसा था कि बहुत-सी भारी घटनाएँ एक साथ घट रही थीं। बात सिर्फ़ प्रेम की नहीं थी — कई पारिवारिक और दुखद घटनाएँ भी थीं। थकान बहुत थी, लेकिन “उफ़” नहीं कर सकता था। चलते रहने के अलावा बैठने का विकल्प भी नहीं था। और उसी दौर में मैंने लिखा —
आज “क़लम” और “स्याही” नहीं,
“पेंसिल” और “काग़ज़”
खरीद लाया हूँ।समय, तू कहानी सुना,
मैं लिखने को तैयार हूँ।
लेकिन “रबर” भूल आया हूँ।
मुझे याद आता है वो शुरुआत का समय, जब तुमने अचानक बात करना बंद कर दिया था। न कोई कारण, न कोई संदेश, न कोई झगड़ा। मैं एक बुत की तरह खड़ा रह गया था — इतना शांत शायद मैं अपने जीवन में कभी नहीं हुआ। अब तो ख़ामोशी को छुपाना भी मुश्किल हो गया था। समय के साथ मेरे अंदर की ख़ामोशी भी आवाज़ लगाने लगी। उस समय लिखने की हालत में तो नहीं था, लेकिन काफ़ी समय बाद जब कुछ होश आया तो उस दौर को याद कर मैंने लिखा —
ऐ “ख़ामोशी”,
आज तेरी आवाज़
क्यों आ रही है?तू चिल्ला-चिल्ला कर
क्यों अपना
अस्तित्व खो रही है?
उसके रहते हुए भी मैंने कई पंक्तियाँ लिखी थीं, लेकिन अफ़सोस — उस समय मेरी साथी क़लम और काग़ज़ नहीं, वो खुद हुआ करती थी। उसी को सुना कर मैं अपने भाव व्यक्त कर लिया करता था। उसका नुकसान ये हुआ कि वो पंक्तियाँ अब मेरे पास नहीं हैं। ख़ैर, कभी कहीं किसी पन्ने में लिखी मिल गईं तो ज़रूर सुनाऊँगा। अभी के लिए बस इतना ही कहकर आपसे विदा लेना चाहूँगा।
