इस संसार की सबसे बड़ी समस्या यही है कि इसको बनाने वाला कोई नहीं है, यह अपने आप बन गया है। और मेरी सबसे बड़ी इच्छा है कि काश इसको बनाने वाला कोई होता। काश भगवान होते, लेकिन मेरे चाहने या न चाहने से भगवान तो नहीं उत्पन्न हो सकते और न यह दुनिया फिर से बनाई जा सकती है।
इंसान की सबसे सुंदर रचना है "भगवान", काश भगवान की सबसे सुंदर रचना होते इंसान। अगर ऐसा होता तो कर्म का सिद्धांत भी होता, बुरे करने वाले को बुरा और अच्छे को अच्छा मिलता, आत्मा होती, परमात्मा होते, पुनर्जन्म होता, जन्म के बाद भी जीवन होता, पितृ देव होते। लेकिन यह सब नहीं हैं, कुछ भी नहीं है।
दुनिया का कोई तर्क भगवान के होने को साबित नहीं कर सकता और इसीलिए एक अतार्किक तर्क आया "भक्ति", प्रेम से थोड़ा हटके और तर्कों से थोड़ा बच के। हाँ, हो सकता है आपको विश्वास है कि भगवान हैं, आपको आभास भी होता होगा लेकिन आभास करता कौन है? दिमाग.. लेकिन दिमाग की जटिलता को भगवान के होने का प्रमाण तो नहीं मान सकते।
फिर भी मैं मान लेता हूँ कि भगवान हैं, हमें भगवान ने बनाया, यह संसार, प्रकृति और इसके नियम सब भगवान ने बनाया। तो भगवान को किसने बनाया? चलो मान लिया कि वो स्वयं उत्पन्न हुए हैं। तो क्या यह दुनिया स्वयं उत्पन्न नहीं हो सकती, क्या जीवन स्वयं उत्पन्न नहीं हो सकता। इसको उत्पन्न होने के लिए भगवान की ज़रूरत ही क्या है?
फिर से कोशिश करते हैं समझने की। यदि हमें कुछ बनाना है तो हमें कौन सी क्रिया करनी पड़ेगी? १) सोचने की और २) हाथ( शरीर) चलाने की। अब भगवान को हमें बनाने के लिए कौन सी क्रिया करनी पड़ी होगी? हाथ से तो नहीं बनाया होगा हमको, या हो सकता है एक प्रोटोटाइप हाथ से बनाया होगा। लेकिन जो भी हो सोचने की क्रिया तो उन्होंने की ही होगी। अब सोचने की क्रिया का विज्ञान न्यूरॉन्स में दौड़ रही बिजली से होता है जो विज्ञान का एक क्षेत्र है। यानी भगवान ने जब सोचा होगा तो ऐसा ही मिलता-जुलता कुछ प्रक्रिया हुई होगी। समस्या यह है कि जब भगवान को सोचने के लिए विज्ञान के इन यंत्रों की ज़रूरत पड़ी होगी तो ये विज्ञान/यंत्र किसने बनाए? क्या ये स्वयं प्रकट हो गए? अगर स्वयं प्रकट हो गए तो ये कैसे कह सकते हैं की भगवान् ने हे ये जगत बनाया या धरा बनाई और हमे जीवन दिया और सवाल फिर वही, कि अगर ये स्वयं प्रकट हो गए तो यह धरती, यह पेड़, यह इंसान या जीव भी स्वयं प्रकट क्यों नहीं हो सकते। हालाँकि स्वयं प्रकट हो जाना एक गलत शब्द होगा क्योंकि यह करोड़ो साल की प्रक्रिया है जहाँ एक कोशिका विकसित होकर जगह और परिस्थिति के अनुसार अलग-अलग जटिल रूप ले लेती रहती है। खैर यह जीवविज्ञान का विषय है।
कोई भी तर्क भगवान के होने को साबित नहीं कर सकता। और इसीलिए भक्ति ईजाद हुई। प्रेम प्रकृति में पहले से था, भक्ति ईजाद हुई है।
भक्ति दो तरह की हो सकती है:
१) भक्ति : प्रेम से उत्प्पन हुई , प्रेम का एक ऐसा स्तर जहाँ आप अपने प्रेमी की भक्ति करने लग जाते है।
२) भक्ति : जिसमे आप किसी के बारे में पढ़ कर, सुन कर, कोई चमत्कार देख कर या लोगो को भक्ति करते देख कर किसी की भक्ति करने लगते हैं।
हम दूसरे पहलु की बात क्र रहे हैं जहाँ प्रेम के बिना भक्ति उत्पन्न हो जाती है।
मैंने देखा है भक्ति(२) को, मैंने किया है प्रेम। भक्ति में लोग कैसे अतार्किक हो जाते हैं, वो गलत को स्वीकार नहीं कर सकते इसलिए गलत को भी सही साबित करने के हर अतार्किक तर्क देते हैं। वहीं प्रेम, भावों में श्रेष्ठ, एक ऐसा भाव जिसको दूर से तो सबने सराहा, पास से लेकिन सिर्फ अपने लिए चाहा। प्रेम, जहाँ दो प्रेमियों के बीच का अंतर बताने वाली रेखा ही मानो मिटा देती है। जहाँ "शरीर" चाह नहीं बल्कि मिलन के बीच की बाधा लगती है। जहाँ आत्मा का अस्तित्व न जानते हुए भी आत्मविलीनता की तड़प उठती है।
