लिखना छोड़ दिया है मैंने। अब बस लिखता हूँ तो समाज, दर्शन और राजनीति के विषयों पर। लेकिन कभी मेरी भी कलम से इश्क़ और दर्द के अल्फ़ाज़ निकला करते थे।
हाँ, अब नहीं लिखता मैं। इश्क़ को कहीं भीतर दबा दिया है और अपने उस दर्द की ओर अब देखता नहीं। सो, देखता हूँ तो समाज में फैले दर्द को और कोशिश करता हूँ उन्हें समझने की।
लेकिन वही, कभी पुराने पन्नों को पलटने पर कुछ न कुछ अनकहा मिल ही जाता है।
आज देखो, क्या मिला—एक कविता।
एक कविता, जो मैंने तब लिखी थी जब मेरे पास उससे कुछ कहने को बाकी नहीं रह गया था। और वाक़ई, उसके बाद मैंने उससे कुछ नहीं कहा। आज दो साल से भी ज़्यादा हो गए हैं, मैंने उससे बात नहीं की।
हालाँकि उसे मुझे छोड़कर गए आज चार साल से भी ज़्यादा हो गए हैं, लेकिन उस समय मैं उसे छोड़कर जा नहीं सका था। और बस उसके इंतज़ार में कब, कैसे एक दिन एक महीने में, एक महीना एक साल में और फिर दो साल में बदल गया, पता ही नहीं चला।
हालाँकि इस बीच वो आया करती थी मुझसे मिलने, हर तीन-चार महीने में। एक सवाल लेकर। और जितनी जल्दी उसे उस सवाल का जवाब मिल जाता, उतनी ही जल्दी वो कोई बहाना बनाकर मुझे फिर एक लंबे इंतज़ार में धकेलकर चली जाती।
और मुझे बख़ूबी याद है, मैं उससे कहा करता था—
“मैं रुका हूँ तुम्हारे लिए, लेकिन जिस दिन मैं चला जाऊँगा, उस दिन लौटकर नहीं आ पाऊँगा।”
और मेरी इस बात में कोई घमंड नहीं था। बस थोड़ा-सा दर्द, या शायद थोड़ा-सा ज़्यादा दर्द… और एक डर था - उसे पूरी तरह खो देने का। मुझे लगता था, कहीं वो कुछ ऐसा न कर दे कि मैं उसे अपना कहने का हक़ और हिम्मत, दोनों खो बैठूँ।
मैं उससे कहा करता था— “तुम जब चाहो, अपनी मर्ज़ी से आ जाती हो, जब चाहे चली जाती हो, और मुझे इंतज़ार के अँधेरे में छोड़ जाती हो। काश, कभी तुम भी गुज़रो इन अँधेरी गलियों से… कितना गहरा है ये अँधेरा, और इसमें पसरी ये ख़ामोशी। ख़ैर, फिर भी मैं तुम्हारा इंतज़ार करता रहूँगा। बस कुछ ऐसा मत करना कि मुझे जाने के लिए मजबूर होना पड़े। क्योंकि मैं फिर लौट नहीं पाऊँगा।”
और फिर कुछ ऐसा ही हुआ। 10 जून 2024 को जब ये जाना कि वो किसी और का हाथ थाम चुकी है, मैं स्तब्ध रह गया। और उस दिन के बाद से मेरे शब्द खो गए। जैसे शब्दों ने अपनी संरचना करना ही बंद कर दिया हो। जैसे अब सब कुछ निरर्थक-सा लगने लगा हो। मैंने कुछ नहीं कहा। कुछ नहीं सुना। बस चला गया। मैं जाना.. नहीं चाहता था, लेकिन रुकने का कोई कारण भी नहीं था।एक हताशा थी, एक निराशा थी… और एक लंबी थकान।
बस।
उसके बाद मैंने उसके ऊपर लिखना बंद कर दिया। असल में, मैंने बंद नहीं किया, बल्कि शब्दों ने ही आकार लेना बंद कर दिया। फिर इसी समय को याद करते हुए मैंने ख़ुद के लिए उसकी तरफ़ से लिखा। क्योंकि मैं जानता हूँ, जिस तरह मैं चुपचाप चला गया था, वो मेरे और उसके लिए कोई आम बात नहीं थी। उसे हैरानी हुई होगी। कुछ पल के लिए ही सही, उसे तकलीफ़ भी हुई होगी। और शायद इसी ख़याल ने मुझे ये सोचने पर मजबूर किया कि अगर मैं उसकी जगह होता, तो क्या कहता।
और फिर… वो बस चला गया।
न कुछ कहा…
न कुछ सुना…
बस आँखों से मेरी ओझल हो गया।जैसे उसने मुझे भुला दिया हो…
अपने ज़ेहन से मेरा वजूद ही मिटा दिया हो।शायद वो रुकना चाहता था…
रोना चाहता था…
कुछ कहना चाहता था…
आराम करना चाहता था…
प्यार करना चाहता था…
प्यार पा…ना… चाहता… था।लेकिन फिर… वो बस चला गया।
न कुछ कहा…
न कुछ सुना…
बस आँखों से मेरी ओझल हो गया।जिसने प्रेम में कभी हार नहीं मानी,
जैसे… अब उसने हार मान ली हो।जैसे उसने अपनी यादों की किताब से
मेरे ऊपर लिखे सभी पन्ने फाड़ दिए हों।शायद वो उस किताब को मेरे प्रेम से सजाना चाहता था,
कुछ पन्ने उस किताब में और लगाना चाहता था,
उसमें कुछ रंगीन ख़्वाब सजाना चाहता था,
उन्हें जीना चाहता था,
उन्हें पढ़कर मुस्कुराना चाहता था।लेकिन फिर… वो बस चला गया,
उन पन्नों को जेब में लिए,
हँसता हुआ चेहरा लिए,
और थोड़ा… सा… ज़्यादा दर्द छुपाए।बिना कुछ कहे…
बिना कुछ सुने…वो बस चला गया।
~ आर्यन
